Tuesday, October 15, 2013

मैकदे में कोई रात उछालें....!!!

Gazal by my great friend Raghvendra Bajpai

"शिकवों-गिलों की जगह वो सौगात उछालें,
अब ज़िन्दगी की कोई नयी बात उछालें.
दिन तो गमों के साए में बीता है बराबर,
आओ के मैकदे में कोई रात उछालें.
दुनिया जो नफ़रतों की कभी बात करे तो,
दुनिया की तरफ इश्क़ के लमहात उछालें.
प्यासी सी सरज़मी के लिए आओ के यारों!!
बिन बादलों की कोई तो बरसात उछालें.
हर ओर बदगुमानियों का दौर जवां है,
ऐसे में कोई नयी सी शुरुआत उछालें.
माना कि कई बाज़ियाँ हारीं हैं जीत के,
उन बाज़ियों की क्यूँ भला शह-मात उछालें.
ये ठीक है के गर्द -ए- सफ़र साथ है लेकिन,
मुफ़लिसी के क्यूँ बेवजह हालात उछालें.
महफ़िल में फक़त ग़ज़ल की ही बात हो ना के,
एक दूसरे की खामखाँ औकात उछालें...!!!"

---Raghu

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